बुधवार, मार्च 11, 2015

प्रकृति से सानिध्य


प्रकृति जैसे यहाँ आकर बस सी गयी है
और उसके हैं अंगणित सुन्दर स्वरुप।
कभी पहाड़ों पर उगते ये पीले फूल,
तो कभी पर्वतों पर छाये बादलों के साये,
जो रोकते हैं धूप।

कभी कल कल करती सरिता,
या कभी गगन चुम्बी इमारतों से ये पेड़
कभी सीली ठंडी हवा
तो कभी हरियाली चरती हुई भेड।

यहीं आकर मिलता है
अनुभव धरती के स्वर्ग का
आकर यहीं होता है आभास
ईश्वर के अस्तित्व का

ये खिलते फूल, फलते तरुवर और झूमती लताएँ
बांधते हैं ऐसा समाँ
कि महक उठता है मन
जैसे महके है मौसम
इस सुन्दर प्रदेश का।

~सुदीप दुबे

यह कविता मैंने गुजरात में सापुतारा नामक पर्वतीय प्रदेश की सुन्दरता से प्रभावित होकर लिखी थी।

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