शुक्रवार, जून 11, 2010

आए महंत वसंत

आए महंत वसंत
मखमल के झूल पड़े हाथी-सा टीला
बैठे किंशुक छत्र लगा बाँध पाग पीला
चंवर सदृश डोल रहे सरसों के सर अनंत
आए महंत वसंत

श्रद्धानत तरुओं की अंजलि से झरे पात
कोंपल के मुँदे नयन थर-थर-थर पुलक गात
अगरु धूम लिए घूम रहे सुमन दिग-दिगंत
आए महंत वसंत

खड़ खड़ खड़ताल बजा नाच रही बिसुध हवा
डाल डाल अलि पिक के गायन का बँधा समा
तरु तरु की ध्वजा उठी जय जय का है न अंत
आए महंत वसंत

- सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

6 टिप्‍पणियां:

  1. ग़ज़ब की कविता ... कोई बार सोचता हूँ इतना अच्छा कैसे लिखा जाता है

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  2. सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
    ji ko parnaam

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  3. Hi Sudeep ..Congrats on the great work that you are doing by posting these poems..Indeed a masterpiece each one of them ..Could you also post the essay 'Himmat aur Zindagi' by ramdhari singh dinkar ..Been looking for it for so long..will be a great help ..Thanks

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  4. Thanks everyone from visiting my blog.
    @Abhineet: Will try and look up for this.

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