सोमवार, अगस्त 31, 2009

हम दीवानों की क्या हस्ती

हम दीवानों की क्या हस्ती,
हम आज यहाँ कल वहां चले
मस्ती का आलम साथ चला,
हम धूल उडाते जहाँ चले

आए बनकर उल्लास अभी
आँसू बनकर बह चले अभी,
सब कहते ही रह गए,
अरे तुम कैसे आए, कहाँ चले?

किस ओर चले? यह मत पूछो,
चलना है, बस इसलिए चले,
जग से उसका कुछ लिए चले,
जग को अपना कुछ दिए चले।

दो बात कही, दो बात सुनी,
कुछ हँसे और फिर कुछ रोये,
छक कर सुख दुःख घूंटों को
हम एक भाव से पिए चले।

हम भिखमंगों की दुनिया में
स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
हम एक निशानी सी उर पर,
ले असफलता का भार चले

हम मान रहित, अपमान रहित
जी भरकर खुलकर खेल चुके,
हम हँसते हँसते आज यहाँ
प्राणों की बाजी हार चले!

हम भला बुरा सब भूल चुके,
नतमस्तक हो मुख मोड़ चले,
अभिशाप उठाकर होठों पर
वरदान दृगों से छोड़ चले

अब अपना और पराया क्या?
आबाद रहे रुकने वाले!
हम स्वयं बंधे थे,
और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!

- भगवतीचरण वर्मा

15 टिप्‍पणियां:

  1. Hum deewanon ki kya hasti...

    Seriously, We never do know where we go, how life pans out..

    all we can do is bring our own little but of sunshine wherever we go :)

    Thanks Dube, its one of my all time faves, and after soooo long youmanaged to find it!! Thanku!!

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  2. Sudeep8:53 pm

    Seriously Shuchi... we never know which way the life will take a turn.. the fun lies in sitting tight on the joy ride and shriek with all your might in excitement when you can!

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  3. This is a precious item of the collection.

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  4. अब अपना और पराया क्या?
    आबाद रहे रुकने वाले!
    हम स्वयं बंधे थे,
    और स्वयं हम अपने बंधन तोड़ चले!

    Read this after such a Long time.. Thx Sudeep .. Thx Suchi... :)

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  5. बेनामी9:20 pm

    this poem is vary good,it's mindblowing poem.
    i like this poem vary vary much.....

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  6. हम दीवानों की क्या हस्ती,
    हम आज यहाँ कल वहां चले
    मस्ती का आलम साथ चला,
    हम धूल उडाते जहाँ चले

    हम भिखमंगों की दुनिया में
    स्वछंद लुटा कर प्यार चले,
    हम एक निशानी सी उर पर,
    ले असफलता का भार चले

    उत्तर देंहटाएं
  7. बेनामी7:41 pm

    Ahh! it brought me back to the old times. i think it was in 8th standard when i read it as it was a part of the curriculum.

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  8. Kya baat hai... Kavi jee kitna susajjit dhang se likha hai... Jarur kavi Premi raha hoga...

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  9. thank you, thank you very much.......
    I searched this poem a lot but......
    thank you sir! it remembers me of my childhood....
    keep it up......

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  10. bhagvati g ki bahut hi sunder rachna hai ise jitna padho utna hi ye dil ke kareeb aati jati hai.............

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  11. wow its really a very nice and quite inspiring poem

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  12. Stuti9:46 am

    Excellent piece... Always motivating!!

    Many thanks for the upload!

    Regards,

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  13. बेनामी9:18 am

    I just recalled this poem after a long long time. Last time I read it was when I was in junior school. I read it just now on the way to office and it made my day. I am feeling so very awesome. Thank you
    Om Prakash Singh

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